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वो भी क्या दिन थे जब आशिक लड़कियों के रुमाल के लिए मरा करते थे |अगर गलती से किसी लड़की का रुमाल मिल जाए तो खुद को खुशनसीब समझते थे |उस रुमाल को जान से भी ज्यादा प्यार करते |उसे तकिये के नीचे रख के सोते |मैं भी सदा यही सपने देखा करता कि काश किसी लड़की का रुमाल मेरे हाथ में भी आता | इस रुमाल को लेकर हमारे गीतकारों ने जाने कितने गीत लिखे |जैसे काली टोपी लाल रुमाल ,रेशम का रुमाल आदि | ये रुमाल जो इतना सर आँखों पर चढा था स्वेन फ्लू ने इसकी ऐसी तैसी करके रख दी है | इस रुमाल, जिसे मैं पाने के सपने देखा करता था कल अचानक से मेरे पास आ गया |हुआ यूँ कि कल एक सहेली मुझसे बात करते करते अपना रुमाल भूल गयी | पर इस रुमाल को लेकर मै बड़ी दुविधा में पड़ गया हूँ | आप पूछेंगे , भला क्यों ? अरे इस स्वेन फ्लू की वजह से | इस रुमाल को न फेंकते बनता है न रखते | इस पर मुझे एक गाना याद आ रहा है .. हांथो में आ गया जो कल रुमाल आपका बेचैन केर रहा है ख्याल आपका …
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आप ने दिया इतना सम्मान कि याद करते हीं मुंह में आ जाता है पान अब तक नाच रहा है जिह्वा पर खीर का स्वाद सदा सुखी रहो है दरिद्र का आर्शीवाद | छोले ,पूरियाँ ,आचार वो रायता भूले कैसे पालक-पनीर का जायका पर क्या कहे हुआ कितना अफ़सोस था मन तो भरा नहीं ,पेट ठूस के हो गया ठोस था | टूट गया धर्म मेरा पहली बार इस भोज में ना बाँध के ले जा सका कुछ भी मैं संकोच में पर चिंता मत कीजिये हमारा कम हीं पाप से मुक्ति दिलाना है तो बस इतना बता दीजिये फिर कब भोज पे आना है | Nishikant Tiwari
इन आँखों के सैलाब से दो बूंद पानी मांग लेते तुम्हे हक़ था मेरी जवानी मांग लेते जाते जाते इतना तो रहम किया होता कि मुझसे अपनी वो प्यार की निशानी मांग लेते Nishikant Tiwari


